पूजहि बिप्र सकल गुण हीना। शूद्र न पूजहु वेद प्रवीणा।। तुलसीदास जी

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पूजहि बिप्र सकल गुण हीना। शूद्र न पूजहु वेद प्रवीणा।। तुलसीदास जी ने क्यों लिखा ? यह चौपाई सर्वथा अशुद्ध है और तोड़ मरोड़कर पेश की जा रही है, जानिए सच
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पूजहि बिप्र सकल गुण हीना। शूद्र न पूजहु वेद प्रवीणा।।  तुलसीदास जी

तुलसीदास जी का सामान्य जीवन परिचय

pujahi vipra sakal gun hina in hindi | पूजहि बिप्र सकल गुण हीना। शूद्र न पूजहु वेद प्रवीणा।।  तुलसीदास जी

गोस्वामी तुलसीदास जी भारतीय संस्कृति के महान कवि थे जिनका जन्म 1532 ईस्वी में उत्तर प्रदेश के जनपद बांदवगढ़, जो अब चित्रकूट जनपद के अंतर्गत आता है, में हुआ था। उनके पिता आत्माराम दुबे और माता हुलसी थीं। तुलसीदास जी को उनके महान और प्रसिद्ध भाषा-शैली के कारण वाल्मीकि के बाद दूसरा आदिकवि कहा जाता है। उनके वास्तविक नाम रामबोला था, लेकिन उनके भगवान राम के भक्ति में खो जाने के कारण उन्हें तुलसीदास के नाम से प्रसिद्ध किया गया। तुलसीदास की रचनाएँ हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण हिस्से में आती हैं, और उनके काव्य और साहित्य ने लोगों को उन्नति की राह दिखाई है।

तुलसीदास जी का जीवन पूर्वाश्रम में उन्हें गोस्वामी ज्ञानिन्द्र मन्दन नाम से जाना जाता था। उनके जीवन का एक अहम पल उनके 18 वर्षीय होते ही निजी जीवन से भगवद्भक्ति में लीन होना था। इसके पश्चात उन्होंने संत गोस्वामी रामानंद से गुरुकुली शिक्षा प्राप्त की और उनके उपदेश से तुलसीदास भक्ति और श्रेष्ठतम जीवन जीने के लिए प्रेरित हुए।

तुलसीदास जी का महत्वपूर्ण योगदान उनकी रचना "रामचरितमानस" की है। यह ग्रंथ मुख्य रूप से अवधी भाषा में लिखी गई है, जिसमें हिन्दी, संस्कृत का भी बहुत अच्छा संयोग है, और हिंदी भाषा के सबसे महत्वपूर्ण काव्यों में से एक माना जाता है। "रामचरितमानस" में भगवान राम के जीवन के कई घटनाओं को सुंदर रूप से वर्णित किया गया है और यह रचना भक्ति, संस्कृति, नैतिकता और धार्मिकता के प्रतीक बन गई है। इस काव्य में भगवान राम के जीवन के अनेक पहलू, उनके संघर्ष, धर्म और नैतिकता के मूल्य विचारों को संक्षेप में वर्णित किया गया है। रामचरितमानस के बारे में कहा जाता है कि यह एक सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली और प्रसिद्ध काव्यिक रचना है जो भारतीय साहित्य में विशेष माना जाता है।

तुलसीदास जी के जीवन का एक और महत्वपूर्ण पहलू उनके सामाजिक सुधार के प्रति उनकी संवेदनशीलता रही। उन्होंने जाति भेदभाव का विरोध किया और समाज में सभी को समान दर्जा देने के लिए आवाज उठाई।

तुलसीदास जी के विचारधारा और उनके शृंगार-भक्ति की कविताओं में एक अद्भुत समन्वय था, जिससे उन्होंने लोगों के दिलों को छू लिया। उनके ग्रंथ आज भी संस्कृति और भक्ति के स्रोत के रूप में लोगों के बीच लोकप्रिय हैं और उनकी कविताएं भाषा, संगीत, और धर्म के मध्य एक अनमोल धरोहर के रूप में जीवित हैं। तुलसीदास जी के योगदान को सदैव स्मरण किया जाएगा और उन्हें भारतीय साहित्य का गर्व माना जाएगा।

तुलसीदास के अन्य महत्वपूर्ण रचनाएँ भगवान शिव व श्रीरामचन्द्र जी की महिमा पर आधारित "विनय पत्रिका", भक्ति और नैतिकता को बयां करने वाली "दोहावली", और प्रेम और भक्ति के विचारों को संबोधित करने वाली "गीतावली" शामिल हैं। इन रचनाओं ने लोगों के चित्त में भक्ति और सद्भावना की भावना को जागृत किया।

कवितावली, कृष्ण गीतावली, रामलला नहछू, रामाज्ञा प्रश्न, जानकी मंगल, पार्वती मंगल, वैराग्य संदीपनी, बरवै रामायण, हनुमान चालीसा, हनुमान बाहुक, संकटमोचन हनुमानाष्टक, राम सतसई, छंदावली रामायण, कुंडलिया रामायण, रोला रामायण, झूलना रामायण, कलिधर्माधर्म निरूपण; यह तुलसीदासजी द्वारा रचित विशेष रचनाएं भी भक्तों के लिए बहुत अनुपम हैं।

श्रीरामचरितमानस की रचना कब हुई

जब भारत पर मुगल शासक **अकबर** का शासन था, उस समय श्रीरामचरितमानस की रचना की गई। इस श्रीरामचरितमानस के रचनाकार गोस्वामी तुलसीदास जी हैं, जो अनेक भाषाओं के जानकार और अयोध्या में ही रहकर उस समय की स्नातकोत्तर तक की पढ़ाई किए थे। इस महाकाव्य का निर्माण 76 साल की उम्र में उन्होंने किया था। श्रीरामचरितमानस भारतीय संस्कृति में अपना एक विशेष स्थान रखता है और श्रीरामचरितमानस की लोकप्रियता हिन्दू समाज में अद्वितीय है।

श्रीरामचरितमानस पर हुए विवाद

जब गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस की रचना की, तो श्रीरामचरितमानस पर जमकर बवाल हुआ क्योंकि हिंदू धर्म के सभी ग्रंथ संस्कृत में थे और तुलसीदास जी ने इस ग्रंथ की रचना सरल और सुबोध अवधी भाषा में किया जिसमें इन्होंने संस्कृत आदि भाषाओं को भी सम्मिलित किया। श्रीरामचरितमानस पर बवाल सिर्फ दो बातों को लेकर हुआ-

पहला; यह पूर्ण रूप से संस्कृत भाषा में क्यों नहीं है?

दूसरा; ‘ढोल गवांर सूद्र पसु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी’ नामक चौपाई पर।

(लेकिन कुछ लोग समय के बदलते दौर के साथ "**पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना**" आदि चौपाइयों का खण्डन करके श्रीरामचरितमानस की निंदा किया करते हैं।)

संत परंपरा के प्रमुख ग्रंथों जैसे ***'मूल गोसाईं चरित' (वेणीमाधव दास) और 'भक्तमाल की टीका' (प्रियादास)*** में एवं संतों के प्रवचन से इस घटना का उल्लेख मिलता है कि —

उस समय बवाल इतना अधिक बढ़ गया कि श्रीरामचरितमानस को जला देने की स्थिति उत्पन्न हो गई। अनेक हिंदू धर्म के विद्वान इसके पक्ष में भी थे और विपक्ष (काशी के विद्वानों सहित) में भी विद्वानों की कमी नहीं थी। बहुत बड़ी धार्मिक पंचायत हुई, जिसमें यह निर्णय लिया गया कि यदि भगवान भोलेनाथ की सहमति इस ग्रंथ को मिले, तभी इस ग्रंथ को सही माना जाएगा अन्यथा गलत। इसके लिए श्रीरामचरितमानस को वाराणसी में श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में सभी ग्रन्थों के नीचे रखा जाएगा और यह शर्त लगाई गई कि यदि सुबह यह ग्रंथ अपने आप सभी ग्रंथों के ऊपर रहेगा तभी इस ग्रंथ को सही माना जाएगा अन्यथा गलत माना जाएगा।

बिल्कुल ऐसा ही हुआ; श्रीरामचरितमानस को श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में सभी ग्रंथों के नीचे रखा गया और सैनिकों की कड़ी पहरेदारी लगायी गयी और धर्मगुरुओं की देख रेख में, ताकि कोई रात्रि में मंदिर में प्रवेश न कर सके, कड़ी निगरानी रखी गयी। इसके पक्ष में जितने विद्वान थे उन्होंने भगवान हरि नाम कीर्तन करना प्रारंभ किया।

जब अर्धरात्रि हुई, तब मंदिर के सभी घंटे एकाएक जोर-जोर से बजने लगे और जब सुबह दरवाजा खोला गया तो श्रीरामचरितमानस सभी ग्रंथों के ऊपर था और उस पर भगवान शिव जी के द्वारा “**सत्यम् शिवम् सुन्दरम् **” नाम से हस्ताक्षर भी हो गये थे। यह घटना सभी को अचम्भित करके रख दी और शासक अकबर भी विचलित हो गया। तब जाकर के इस ग्रंथ को महत्ता मिली।


पूजहि विप्र सकल गुण हीना। शुद्र न पूजहु वेद प्रवीणा।। इस चौपाई का सही रूप व अर्थ

इस अशुद्ध चौपाई जिसको बोलकर विरोध किया जाता है, नकारात्मक विचारधारा वाले लोगों द्वारा सही रूप "**पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।।**" को तोड़ मरोड़ कर —

पूजहि बिप्र सकल गुण हीना। शूद्र न पूजहु वेद प्रवीणा।।

पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न पूजहु वेद प्रबीना।।

<span style="color: #cc0000;">पूजहि विप्र ज्ञान-गुण हीना, सूद्र न पूजहि वेद प्रवीणा।।</span>

आदि तरह-तरह का रूप दे देकर अनेक प्रकार के भ्रामक लेख लिखे जाते हैं और भ्रामक विडियो बनाकर, तथा सम्मेलनों में गलत प्रकार से भाषण देकर श्रीरामचरितमानस की निंदा की जाती है। दरअसल श्रीरामचरितमानस की कुछ चौपाइयों के सहारे कुछ नकारात्मक विचारधारा वाले लोगों के द्वारा आजकल ऑनलाइन व ऑफलाइन दोनों विधियों द्वारा हिन्दू नवयुवकों व नासमझ हिन्दुओं को भ्रमित किया जाता है व श्रीरामचरितमानस का दुष्प्रचार किया जाता है। ताकि भोले-भाले हिन्दू लोग, हिन्दू धर्म से विमुख होकर अन्य धर्मों को ग्रहण कर लें।

यह चौपाई गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा विरचित श्रीरामचरितमानस के अरण्यकाण्ड में 33वें व 34वें दोहे के बीच की दूसरी चौपाई है। पूरा अंश इस प्रकार है —

संकुल लता बिटप घन कानन। बहु खग मृग तहँ गज पंचानन।।

आवत पंथ कबंध निपाता। तेहिं सब कही साप कै बाता।।

दुरबासा मोहि दीन्ही सापा। प्रभु पद पेखि मिटा सो पापा।।

सुनु गंधर्ब कहउँ मै तोही। मोहि न सोहाइ ब्रह्मकुल द्रोही।।

दोहा- मन क्रम बचन कपट तजि जो कर भूसुर सेव।

मोहि समेत बिरंचि सिव बस ताकें सब देव।।33।।

सापत ताड़त परुष कहंता। बिप्र पूज्य अस गावहिं संता।।

पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।।

कहि निज धर्म ताहि समुझावा। निज पद प्रीति देखि मन भावा।।

रघुपति चरन कमल सिरु नाई। गयउ गगन आपनि गति पाई।।

ताहि देइ गति राम उदारा। सबरी कें आश्रम पगु धारा।।

सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ भाए।।

सरसिज लोचन बाहु बिसाला। जटा मुकुट सिर उर बनमाला।।

स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। सबरी परी चरन लपटाई।।

प्रेम मगन मुख बचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा।।

सादर जल लै चरन पखारे। पुनि सुंदर आसन बैठारे।।

दोहा- कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि।

प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि।।34।।

श्री गोस्वामी तुलसीदास जी के अनुसार इसका सही अर्थ इस प्रकार है —

चूंकि हर चौपाई का संबंध अपनी अगली व पिछली चौपाई से रहता है। श्रीरामचरितमानस की किसी भी चौपाई का भाव समझने के लिए उसके ऊपर व नीचे की चौपाइयों को भी देखना/समझना चाहिए तथा सम्बन्धित चौपाई किस प्रसंग में और क्यों आया है; यह भी जानना नितांत आवश्यक है।

इस चौपाई (पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।।) का संबंध भी पिछली चौपाई व राक्षस कबंध से है । हालांकि श्रीरामचरितमानस में कबंध राक्षस के बारे में कम विवरण है, अपितु महर्षि वाल्मीकि जी कृत रामायण में विस्तृत विवरण है। दअरसल, कबंध राक्षस द्वारा ऋषियों को परेशान करने के कारण, कबंध राक्षस को पूर्व जन्म में दुर्वासा ऋषि ने क्रोधित होकर श्राप दिया था। इसलिए यहां कबंध राक्षस, श्राप व ऋषि दुर्वासा जी के क्रोध को प्रभु श्री रामचन्द्र जी से बता रहा है।

कबंध राक्षस श्री रामचन्द्र जी से कह रहा है कि मैं इस राक्षस रूप से पहले गन्धर्व था, लेकिन गलती के कारण मुझे दुर्वासा ऋषि ने श्राप देकर राक्षस बना दिया था, जो कि यह राक्षस रूप आज आपके दर्शन से दूर हो गया।

तब श्री राम चन्द्र जी कह रहे हैं कि, हे गन्धर्व! मैं तुमसे कहता हूॅं, सनो- मुझे ब्रह्म कुल द्रोही नहीं सुहाता।

सापत ताड़त परुष कहंता। बिप्र पूज्य अस गावहिं संता।।, इस चौपाई से अभिप्राय है कि, श्री रामचन्द्र जी ने कहा कि “सापत” अर्थात्‌ ‘श्राप देता हुआ’, “ताड़त” अर्थात्‌ ’ देखना, समझाना, उपदेश देना, सीखाने हेतू डांटना-फटकारना’ हुआ और “परूष” अर्थात् ‘कठोर वचन कहता हुआ’ ब्राह्मण भी पूज्य है; ऐसा संत कहते हैं।

पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।।, इस चौपाई का प्रत्येक शब्द गंभीर विचार के योग्य है, और जिनको हिन्दू धर्म व अवधी भाषा का पूर्ण रूप से ज्ञान नहीं है, वे लोग इस चौपाई का गलत अर्थ निकालते हैं और सही अर्थ नहीं समझ पाते हैं।

अब आइए एक-एक शब्द का शाब्दिक अर्थ देखें:

पूजिअ = पूजा जाए / सम्मान किया जाए

बिप्र = तपस्वी ब्राह्मण

सील = शील, यानी अच्छा आचरण, विनम्रता, सदाचार

गुन हीना = गुणों से हीन, यानी जिसमें कोई विशेष गुण न हो

सूद्र = शूद्र कौन है? पढ़िए प्रमाण!

= नहीं

गुन = गुण (अच्छाई, सद्गुण)

गन = गुणों का गणना करना / गुणों को मानना

ग्यान = ज्ञान

प्रबीना = प्रवीण, यानी किसी चीज़ में दक्ष, निपुण, माहिर

पूजिअ बिप्र सील गुन हीना।; इस अर्ध चौपाई में 'बिप्र' शब्द का जो प्रयोग हुआ हैं, तपस्वी ब्राह्मण के लिए प्रयोग हुआ है। और '**सील गुन**' शब्द का जो प्रयोग हुआ है, उसका तात्पर्य (तत्पुरुष समास के अनुसार) **शील** अर्थात्‌ सदाचार और यदि द्वंद्व समास से देखें तो **शील और गुण** से हीन, (लेकिन यह जरूरी नहीं कि जिसके पास कोई गुण नहीं वह अवगुणों से युक्त होगा)। अर्थात् यदि ब्राह्मण का स्वभाव कठोर है तो भी वह पूजनीय है। जैसे दुर्वासा जी।

सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।।; इस भाग का सही अर्थ निकालने के लिए आपको इसे दो भागों में बांटना पड़ेगा!

‘सूद्र न’ अर्थात्‌ शूद्र नहीं है, क्या नहीं है, पूजनीय नहीं है।

‘गुन गन ग्यान प्रबीना’ अर्थात्‌ अगर कोई शूद्र गुणी, विद्वान, या ज्ञानी भी हो या गिना जाता हो, तो भी वह पूजनीय नहीं है।

{ध्यान रहे: यहां पूजनीय (केवल निःस्वार्थ भाव युक्त) की बात हो रही है, सम्माननीय (नि:स्वार्थ + स्वार्थ सिद्धि हेतु) की बात नहीं हो रही। यहां शूद्र सम्माननीय है या नहीं, इसके बारे में तुलसीदास जी कुछ नहीं कह रहे, और यह उसके गुण और पद निर्धारित करेंगे।}

इन सबके पीछे श्री रामचन्द्र जी का अभिप्राय था, कि दुर्वासा जी के अवगुण (कठोरता) तो तू देख रहा है, लेकिन इनके जीवन में जो तप, त्याग, गुण और विशेषताएँ हैं; उनके ऊपर तुम्हारी दृष्टि नहीं जाती।

विप्र शब्द अपने में बहुत बड़ा शब्द है, विप्र वह है जो भगवत् भक्त हैं, तीनों समय संध्या वंदन करता है, मांस-मदिरा का सेवन नहीं करता, सदाचारी है, आदि आदि, तो वह पूजनीय होता ही होता है, क्योंकि उनका कर्म अत्यंत श्रेष्ठ है, और जन्म से ही ब्राह्मण को पूजनीय मानना पड़ता है, चूंकि पारंपरिक वह यह सब उत्तम कर्म करता हो।

यदि कोई व्यक्ति सकल गुणों से हीन है तो वह केवल ब्राह्मण होने से तब पूजनीय है जब वह भगवान का भक्त हो, या अपने देश या लोगों की भलाई के लिए कोई महान कार्य किया हो। यदि उसमें यह सब नहीं है तो वह पूजनीय नहीं है, भले ही वह सम्माननीय हो।

जैसे कि मांस-मदिरा का सेवन करने वाला, अपने धर्म का पालन न करने वाला ब्राह्मण कुल में उत्पन्न व्यक्ति यदि कोई आधिकारिक पद पर हैं तो वह सम्माननीय है, लोग अपने स्वार्थ के लिए उनका सम्मान करेंगे लेकिन वे सभी के लिए पूजनीय हों ऐसा जरूरी नहीं है।

माता-पिता, गुरु, और भगवान के भक्त (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र, कोई भी) हमेशा पूजनीय ही होते हैं। उदाहरण, **महात्मा विदुर, माता शबरी, संत नामदेव, भक्त नंदनार, भक्त कनकदास, संत चोखामेला या संत रविदास जी** का जन्म भले शूद्र कुल में हुआ था, लेकिन वे भगवत् भक्ति की वजह से पूजनीय हैं।


ढोल गवांर सूद्र पसु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी - इस चौपाई का सही अर्थ

"ढोल गवांर सूद्र पसु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी" यह चौपाई रामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड में 58 व 59वें दोहे के बीच 6वीं चौपाई है। यह चौपाई समुद्र व श्री रामचन्द्र के बीच वार्तालाप की स्थिति का वर्णन करता है। पूरा अंश इस प्रकार है-

दोहा- बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति।

बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति।।57।।

लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू।।

सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती।।

ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी।।

क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा।।

अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा।।

संघानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला।।

मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने।।

कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना।।

दोहा- काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।

बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच।।58।।

सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।।

गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी।।

तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए।।

प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहे सुख लहई।।

प्रभु भल कीन्ही मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही।।

ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।।

प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई।।

प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जौ तुम्हहि सोहाई।।

दोहा- सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।

जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ।।59।।

जब भगवान श्री रामचंद्र जी समुद्र को पार करने के लिए समुद्र की इच्छा मांग रहे थे, तो समुद्र भगवान रामचंद्र जी की उपासना को नहीं समझ रहा था कि भगवान रामचंद्र जी क्या चाहते हैं ? 3 दिन तक समुद्र की पूजा करने के बाद भी समुद्र प्रगट नहीं हुआ, इसलिए श्री रामचंद्र जी ने क्रुद्ध होकर लक्ष्मण से कहा कि लक्ष्मण ! हमारा धनुष बाण लाओ; मैं अभी समुद्र को सुखा देता हूं। जब उन्होंने आग्नेयास्त्र का संधान किया तो पूरा समुद्र उबलने लगा। तब समुद्र ने डरकर अपना रूप धारण किया और श्री राम जी के सामने उपस्थित हुआ और वह इस प्रकार से श्री रामचंद्र जी की विनती कर रहा है कि हे प्रभु ! मुझे दास पर दया कीजिए!

यहां '**ताड़ना**' का अर्थ 'अनुशासन, डांटना, देखना (समझने के अर्थ में), परखना और भाँपना ' होता है, सीधे मारना नहीं होता। साथ ही यह श्लेष अलंकार (बहू अर्थी) युक्त शब्द है अर्थात् प्रत्येक संज्ञा के लिए अलग प्रकार से अलग अर्थ; जैसे- "हमने तो उसकी बात पहले ही ताड़ ली थी या वह हमारी बात तुरंत ताड़ गया।" एक उदाहरण: गुरु जन ताड़ें बालकन” — यानी गुरु लोग बच्चों को अनुशासन में रखते हैं। एक उदाहरण: “ढोल ताड़े बिना न बाजे” — ढोल बिना ताड़े नहीं बजता, यानी नियंत्रण जरूरी है।

लेकिन लोग ताड़ना का अर्थ सीधे मारना-पीटना निकालते हैं और तुलसीदास जी द्वारा लिखे गए श्री रामचरितमानस की निंदा करते हैं; यह निंदा करने वालों की मूर्खता है। एक कहावत प्रचलित है “अर्थ का अनर्थ करना”, अर्थात् किसी चीज को यदि ठीक ढंग से ना समझा जाये तो उसका गलत अर्थ निकलता है। ठीक ऐसा ही इस दोहे के साथ वामपंथी विचारधारा के लोग करते हैं। विस्तृत और सही अर्थ इस प्रकार है —

ढोल: ढोल के विषय में ताड़ना शब्द का अर्थ इस प्रकार है- ढोल को बजाने की कला होनी चाहिए, ढोल में रस्सियां लगी होती है, उन्हें सही से समायोजित करना पड़ता है, तब उस पर थाप दी जाए तो उसमें से अच्छी ध्वनि निकलती। यही नहीं, उसकी ताड़ना भी संगीत सम्मत होनी चाहिए ताकि उसमें से ध्वनि लयबद्ध रूप से निकले ना कि उसका स्वर कर्कश हो जाता है। अर्थात् यह भी समझाने वाली चीज है, या आप अपने दिमाग से इसे जैसे जैसे बजाएंगे वैसे वैसे यह कार्य करेगा, बजेगा। ऐसा नहीं है कि बस पीटते जा रहे हैं पीटते जा रहे हैं।

गवांर: गवांर का अर्थ अज्ञानी होता है और यहां ताड़ना का अर्थ है दृष्टि रखना व समझाना। अज्ञानी को यदि कोई कार्य दिया जाए और उसपर दृष्टि ना रखी जाए तो वह कार्य वह कभी भी सही ढंग से नहीं कर सकता। इसीलिए जब तक किसी को किसी चीज के विषय में पूर्ण ज्ञान ना हो तब तक उसपर दृष्टि रखनी चाहिए।

सूद्र: सबसे अधिक आपत्ति इसी शब्द पर होती है। गुरु के सही ताड़न (मार्गदर्शन) के बिना वो गलत ज्ञान प्राप्त कर सकता है। शूद्र सिर्फ जाति से ही नहीं होते, कर्म से भी हो जाते हैं। तुलसीदास जी की रचना में समुद्र का श्री रामचंद्र जी से कहने का कि यही तात्पर्य है कि शूद्र को भी सही रास्ते पर लाने के लिए शिक्षा की जरूरत होती है। शूद्र को ताड़ने का मतलब है कि शूद्र को समझाया जाए कि कोई कार्य कैसे करना है।

पसु: पशुओं को हिन्दू धर्म में बहुत मूल्यवान माना गया है, इसीलिए उन्हें “पशुधन” कहा गया है। इनके विषय में ताड़न का अर्थ है देख-रेख करना। पशु बुद्धिहीन है, जिधर हांक दो, उधर चला जाएगा, किन्तु मूल्यवान है। अतः उसे हर समय सही देख-रेख की आवश्यकता होती है। जब पशु झुंड में चलते हैं तो एक व्यक्ति सदैव देखभाल के लिए उनके साथ होता है ताकि पशु इधर उधर ना भटक जाएं। उसी प्रकार खेत में हल जोतने वाला बैल केवल कृषक के वाणी मात्र से ये समझ जाता है कि उसे किस दिशा में मुड़ना है व कैसे चलना है।

**नारी: **इसपर भी सर्वाधिक आपत्ति होती है किंतु यहां नारी के विषय में ताड़ना का अर्थ है देखरेख, उनका ध्यान रखना, अनुशासन में रखना एवं रक्षा करना। नारी समुद्र मंथन में निकली लक्ष्मी के समान पवित्र और आदरणीय है और इसीलिए ये आवश्यक है कि उनका सदैव ध्यान रखा जाए।

हमारी पवित्र हिंदू संस्कृति ऐसे ही महान नहीं है, इसके कुछ संस्कार हैं, कुछ नैतिक मूल्य हैं; इसलिए हमारी हिंदू संस्कृति महान कही जाती है। स्त्री को कभी अकेला नहीं छोड़ना चाहिए, उनका सदैव ध्यान रखना चाहिए और एक रत्न की भांति उनकी रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए।

समय व परिस्थिति के अनुसार हिन्दू या सनातनी स्त्रियाँ युद्ध, व्यवसाय इत्यादि सभी कर्म करती हैं, जैसा कि हिन्दू धर्म आदेश देता है।

CONCLUSION

तुलसीदास का साहित्य न सिर्फ धार्मिक और भक्तिकाल के साथ जुड़ा था, बल्कि उन्होंने लोगों के अधिकारों की रक्षा करने वाले काव्य भी रचे। उनका रचनाएं समाज में जागरूकता पैदा करती है।

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