50+ Best Political Shayari in Hindi | कटाक्ष और व्यंग्य वाली राजनीतिक शायरी

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राजनीतिक भाषण में उपयोग होने वाली 50+ बेहतरीन राजनीतिक शायरियाँ व प्रसिद्ध पंक्तियाँ और विरोधियों पर तीखे कटाक्ष। Political shayari in Hindi
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50+ Best Political Shayari in Hindi | कटाक्ष और व्यंग्य वाली राजनीतिक शायरी

Best Political Shayari in Hindi

राजनीति में केवल आँकड़े और तथ्य ही काफी नहीं होते, बल्कि जनता के दिलों पर राज करने के लिए शब्दों में वह धार होनी चाहिए जो विरोधियों को निरुत्तर कर दे और समर्थकों में जोश भर दे। आपने अक्सर डॉ. सुधांशु त्रिवेदी व अन्य विशिष्ट राजनेताओं, वक्ताओं को अपनी तार्किक बातों को कविताओं से सजाते सुना होगा।

Best Political Shayari in Hindi | कटाक्ष और व्यंग्य वाली राजनीतिक शायरी

एक सफल नेता वही है जो समय की नब्ज पहचानकर सटीक कटाक्ष (Sarcasm) करना जानता हो। अगर आप भी अपने भाषण को प्रभावशाली, रंगीन और वायरल होने लायक बनाना चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए ही है।

इस पोस्ट में हमने संकलित की हैं 50 से अधिक ऐसी अनोखी और लयबद्ध राजनीतिक शायरियाँ, जो न केवल सुनने में कर्णप्रिय हैं, बल्कि विरोधियों पर ‘भयंकर’ प्रहार करने में भी सक्षम हैं। चाहे आप सत्ता पक्ष में हों या विपक्ष में, ये पंक्तियाँ आपके भाषण में चार चाँद लगा देंगी।

कभी साज दिल में तराने बहुत हैं, अभी जिंदगी में फसाने बहुत हैं। दरे गैर भीख खैर मांगो न फन की, जब अपने ही घर में खजाने बहुत हैं।। — अज्ञात

फटकचंद गिरधारी, ना लुटिया ना थारी।

चौराहे पर चीख रहे हैं चोरी हुई हमारी।। — देहाती कहावत

पैरवी जो झूठ की करता चला गया,

बस उसका चेहरा उतरता चला गया।

रंगत समझ में आई मगर आई बहुत देर से,

कच्चा था बहुत रंग उतरता चला गया।। — अज्ञात

लहजे में बद्दजुबानी, चेहरे पे नकाब लिए फिरते हैं।

जिनके खुद के बही खाते बेहिसाब बिगड़े हैं,

वे भी हमारे हिसाब लिए फिरते हैं।।
— अज्ञात

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गयी,

पांव जब तलक बढ़े कि जिंदगी फिसल गयी।

और हम खड़े खड़े मोड़ पर रूके रूके,

ऊम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे। कि

कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे।। — अज्ञात

कश्ती भी न बदली दरिया भी ना बदला।

इन डूबने वालों ने नजरिया भी न बदला।।

है शौक-ए-सफ़र ऐसा एक उम्र खोई हमने।

मंजिल भी नहीं पाई रास्ता भी नहीं बदला।। — अज्ञात

काजू भुना है प्लेट में ह्विस्की गिलास में,

उतरा है रामराज्य वो विधायक निवास में।

पक्के समा*वादी हैं तस्कर हों या डकैत,

कितना असर है खादी के उजले लिबास में।। — अदम गोंडवी (वास्तविक नाम रामनाथ सिंह)

पप्पू टीपू और बुआजी सबका दिल डर से डोल रहा है, रंग बहुत हैं आज चमकते और ऊपर भगवा डोल रहा है। — सुधांशु त्रिवेदी

कौन बंधा भंवरा किस फूल से, जान रहा यह बाग का माली।

किंतु कली को यही लगता, उसने सबसे यह बात छुपा ली।

कंज से नैन पे अंजन हैं, यह रूप सिंगार यह होंठ पे लाली।

कह रहे हैं कुछ दाल में काला, हम जान रहे पूरी दाल है काली।।

— प्रियांशु गजेंद्र

तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है,

मगर ये आँकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है।

उधर जम्हूरियत का ढोल पीटा जा रहा है फिर,

इधर बदहाली का आलम अभी तक ला-जवाबी है।

— अदम गोंडवी (वास्तविक नाम रामनाथ सिंह)

सारे परमिटवा लाइसेंस ठेके गए। देखते देखते ऐसे देखे गए।।

जब भी खादी पहनते थे मेरे सजन। फेंकते थे बहुत खुद ही फेंके गए।।

— प्रियांशु गजेंद्र

शाम तक सुबह की नजरों से उतर जाते हैं, इतने समझौतों पर जीते हैं कि ज़मीर भी मर जाते हैं। — सुधांशु त्रिवेदी

छांह की चाह लेकर तपन में गए। सत्य की खोज करने सपन में गए।।

पार भव सिंधु करने गए थे पिया। डूब मोनालिसा की नयन में गए।।

— प्रियांशु गजेंद्र

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,

मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

— दुष्यंत कुमार

कि अब जो चेहरे से ज़ाहिर है छुपाएं कैसे,

तेरी मर्जी के मुताबिक नजर आएं कैसे..!

अब घर सजाने का तसव्वुर हो बाद की बात, अब तो मुश्किल है इस घर की हकीकत को छुपाएं कैसे।। — अज्ञात

एक छोटी सी बात तुम्हें समझाते हैं। मुस्काते हैं फूल और मुरझाते हैं।।

आसमान में उड़ने वाले पंछी हैं ना। एक न एक दिन धरती पर ही आते हैं।।

— प्रियांशु गजेंद्र

जब नाश मनुज पर छाता है,

पहले विवेक मर जाता है।

— रामधारी सिंह दिनकर

न तुम्हीं मिले न मयश्शर तुम्हारी दीद हुई,

तुम्हीं कहो कि यह मुहर्रम या ईद हुई..।।

— अज्ञात

मिटे नामियों के निशां कैसे कैसे, कि

यह जमीं खा गयी आसमां कैसे कैसे।

— अज्ञात

मुकद्दर की हर एक साजिश को अब दूर से हम भाप लेते है। ग़मो की आंच में खुद को जला कर ताप लेते हैं।

हमारे घर में इतने हादसे हो गए हैं कि अब कदम रखते है जिस घर में उसकी दीवारें नाप लेते है।।

— प्रियांशु गजेंद्र

अंधेरा ढ़कले सूरज को उजाले की खता क्या हो।

लगी हो सेंध दीवारों में ताले की खाता क्या हो।।

किसी के रूप की मदिरा नशे से भी नशीली हो।

कोई पी के मर जाए प्याले की खता क्या हो।।

— प्रियांशु गजेंद्र

दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,

जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों।

— बशीर बद्र

दरिया का सारा नशा उतरा चला गया।

वो मुझे डुबाते रहे मैं उभरता चला गया।

यह 99-52-6 को मंजिल समझकर बैठ गए।

मैं ऐसे कितने रास्तों से गुजरता चला गया।।

— अज्ञात

लक्ष्य पर हम सधे थे सधे रह गए, हाथ पहिले बंधे थे बंधे रह गए।

एक आई लहर तुम हुए मंत्री, हम गधे थे गधे हैं गधे रह गए।।

— प्रियांशु गजेंद्र

यह तन प्रभु राम का मान प्रभु राम का,

तो हर पल बोलिए जय श्रीराम की।

आस प्रभु राम की श्वास प्रभु राम की,

तो हर पल बोलिए जय श्रीराम की।

लोक परलोक यह यही मोक्ष धाम है,

तो हर पल बोलिए जय श्रीराम की।

शासन चलवाए चाहे सीने पर गोलियां,

परवाह नहीं कीजिए शरीर और प्राण की।

आएं आपदाएं विपदाएं चाहे कितनी

बनाएंगे वही मंदिर सौगंध श्रीराम की। — श्रीराममंदिर कारसेवक गण

चमन को सींचने में पत्तियां कुछ गिर रही होंगी,

यही इल्जाम हमपर लग रहा है बेवफाई का।

पर कलियों को जिसने रौंद डाला अपने हाथों से

वही दावा कर रहे चमन के रहनुमाई का।।

— अज्ञात

मुझे दुनिया वालों शराबी न समझो,

मैं पीता नहीं हूं पिलाई गई है..!

और जिधर बेखुदी में कदम लड़खड़ाए,

वही राह मुझको दिखाई गयी है‌।।

— अज्ञात

कुर्सी है जनाब, कोई जनाजा तो नहीं है,

कुछ तो मर्यादा रखिए, तमाशा तो नहीं है।

— अज्ञात

वो कत्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती,

हम आह भी भरते हैं तो बदनाम हो जाते हैं।

— अमीर मीनाई

कैसे आकाश में सुराख नहीं हो सकता,

एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों।

— दुष्यंत कुमार

सदियों की ठंडी-बुझी राख सुगबुगा उठी,

मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है।

— रामधारी सिंह दिनकर

सफर में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो,

सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो।

— बशीर बद्र

बदले हुए वक्त के साथ सब कुछ बदल जाता है,

कल जो साथ थे आज उनका पाला बदल जाता है।

— अज्ञात

कल तक जो कहते थे कि हम तो फकीर हैं,

आज उनकी मुट्ठी में सबकी तक़दीर है।

बदला जो वक्त तो वो खुद भी बदल गए,

कल के जो प्यादे थे आज वही वजीर हैं।।

— अज्ञात

भाषण में मिठास है और बातों में शहद है,

पर नीयत की खराबी की कोई न हद है।

जनता के दुखों पर जो आंसू बहाते हैं,

असल में उन्हीं के पास दुखों की रसद है।।

— अज्ञात

चमकते हुए चेहरों पर नकाब बहुत हैं,

सियासत की महफिल में ख़्वाब बहुत हैं।

सवाल जो किया हमने रोटी व मकान का,

तो बोले कि हमारे पास गुलाब बहुत हैं।।

— अज्ञात

गिराकर अपनी ही नजरों में खुद को मुस्कुराते हैं,

वो कुर्सी के लिए अपनों का घर तक जलाते हैं।

दुआएँ मांगते फिरते हैं जो कल तक अवाम से,

वही आज जनता को अपनी आँखें दिखाते हैं।।

— अज्ञात

इधर से उधर और उधर से इधर,

बदलते हैं पाला ये शाम-ओ-सहर।

ईमान का इनके कोई ठिकाना नहीं,

जिधर देखी मलाई बस उधर ही नजर।।

— (व्यंग्य)

झूठ की खेती है और वादों की खाद है,

गरीब को यहाँ बस चुनावों में याद है।

सिंहासन की जंग में सब कुछ है जायज,

चाहे घर उजड़े या कोई शहर बर्बाद है।।

— अज्ञात

सफेदपोश कपड़ों में काले कारनामे हैं,

हर फाइल के पीछे छिपे कई ड्रामे हैं।

जो जनता के रक्षक वही भक्षक बन बैठे,

यहां तो बस लूट के ही सारे हंगामे हैं।।

— अज्ञात

मुँह में राम बगल में छुरी लेकर घूमते हैं,

सत्ता के नशे में जो मदहोश झूमते हैं।

वक्त बदलेगा तो ये भी मिट्टी में मिल जाएंगे,

अभी जो आसमान के सितारों को चूमते हैं।।

— अज्ञात

कागज की नाव है और लालच की पतवार है,

बहती हुई गंगा में सबकी अपनी सरकार है।

तट पर खड़ा हुआ प्यासा ही मर गया बेचारा,

और ये कहते हैं कि विकास की आई बहार है।।

— अज्ञात

मंच से जो शेर बनकर दहाड़ते फिरते हैं,

अकेले में वो खुद के साये से डरते हैं।

जनता की अदालत में जब पेशी होगी उनकी,

देखना कैसे वो फिर गिड़गिड़ाते फिरते हैं।।

— अज्ञात

जुबां पर शहद और दिल में ज़हर रखते हैं,

वो अपनों की खुशियों पर भी नज़र रखते हैं।

बदल देते हैं अपनी वफादारी हर मौसम में,

वो हर एक दल में अपना एक घर रखते हैं।।

— अज्ञात

महल के झरोखों से वो गाँव देखते हैं,

बिना चले ही रास्तों के पांव देखते हैं।

उन्हें क्या खबर कि धूप क्या होती है साहब,

वो तो कड़ी धूप में भी एसी की छांव देखते हैं।।

— अज्ञात

सियासत का चश्मा उतारकर देखो जरा,

इंसानियत का चेहरा निहारकर देखो जरा।

कुर्सी तो आती-जाती रहेगी उम्र भर,

जनता का दिल थोड़ा जीत कर देखो जरा।।

— अज्ञात

जो कल तक गालियाँ देते थे एक-दूजे को,

आज गले मिल रहे हैं वो अपनी जीत की खातिर।

सिद्धांतों का जनाज़ा बड़े धूम से निकलता है,

जब मिलते हैं दो दुश्मन अपनी प्रीत की खातिर।।

— अज्ञात

सिंहासन क्या गया कि आपकी तो नींद ही उड़ गई,

कल तक जो सीधी थी, वो गर्दन आज मुड़ गई।

जब हाथ में थी सत्ता तो खुदा बने बैठे थे,

आज दर-दर भटक रहे, किस्मत ही फूट गई।।

— अज्ञात

दामन पे जिनके दाग हैं वो आईना दिखाते हैं,

जो खुद डूबे थे दलदल में वो रास्ता बताते हैं।

अजीब दौर है ये भी सियासत की गलियों का,

जिन्होंने लूटा है बहुत अब मसीहा कहलाते हैं।।

— अज्ञात

कल तक जो कहते थे हम ही खुदा हैं यहाँ के, आज वो खाक छानते फिरते हैं गली-कूचों में यहाँ के। वक्त की मार पड़ी तो सब हेकड़ी निकल गई, अब पहचानते भी नहीं लोग उन्हें अपने ही जहाँ के।।

— अज्ञात

हुकूमत हाथ से निकली तो अब सिद्धांत याद आए,

जब कुर्सी पास थी तब तो बस षड्यंत्र याद आए।

लूट-खसोट में गुजरी थी जिनकी पूरी जवानी,

अब बूढ़े हुए तो उन्हें देश के बसंत याद आए।।

— अज्ञात

पुराने सिक्के अब इस बाजार में चलते नहीं,

तुम्हारे झूठे वादे अब किसी को छलते नहीं।

तुम वो बुझते हुए दिए हो लौ कांप रही है,

कितना भी तेल डालो, अब तुम जलते नहीं।।

— अज्ञात

शमा बुझ गई है पर धुएं की अकड़ अभी बाकी है, रियासत छिन गई पर कल की वो जकड़ अभी बाकी है। हवाओं ने बता दिया कि तुम्हारा दौर गुजर गया, मगर इन खण्डहरों को लगता है ठाठ अभी बाकी है।।

— अज्ञात

वो जो महलों में बैठकर शहर को उजाड़ते थे,

जनता की गाढ़ी कमाई दिन-दहाड़े फाड़ते थे।

आज सड़क पर खड़े हो न्याय की गुहार करते हैं,

वही जो कल तक मंच से शेर बन दहाड़ते थे।।

— अज्ञात

उतरे हुए चेहरे हैं और कल के नवाब हैं,

मांगते फिर रहे जो कल तक देते हिसाब हैं।

कलम की स्याही सूख गई, अब कोरे कागज हैं,

तुम्हारी सियासत की बंद हो चुकी वो किताब है।।

— अज्ञात

खादी की चमक गई, अब बस झुर्रियां बाकी हैं,

किए हुए पापों की अब बस पोटलियां बाकी हैं।

जो जनता को कीड़ा-मकोड़ा समझते थे कल तक,

उनकी अदालत में अब खाली कुर्सियां बाकी हैं।।

— अज्ञात

कल जो साथ थे, आज वो किनारा कर गए,

तुम्हारे पाले परिंदे आज किसी और के घर गए।

सियासत में वफादारी की उम्मीद भी किससे करें,

जो तुम्हारे अपने थे, वही तुम्हें बेसहारा कर गए।।

— अज्ञात

दुआएँ ले रहे हैं अब जो गालियाँ देते थे,

हाथ जोड़ रहे हैं जो कभी रिश्वत लेते थे।

कुदरत का न्याय देखिए कितना सटीक है,

मांग रहे हैं भीख वो, जो कभी हुक्म देते थे।।

— अज्ञात

खामोश जुबां है मगर आँखों में कल का गुरूर है,

सत्ता से बाहर होकर भी चेहरे पर वही फितूर है।

तुम क्या बदलोगे मुकद्दर इस नए दौर का,

तुम्हारा तो अपना ही वजूद अब चकनाचूर है।।

— अज्ञात

वक्त ने तुम्हें अर्श से फर्श पर ला पटका है,

तुम्हारी राजनीति का अब गला ही अटका है।

ढूँढते फिर रहे हो अब खोई हुई विरासत,

मगर जनता को हर एक राज तुम्हारा खटका है।।

— अज्ञात

जो खुद कांच के घरों में रहते थे उम्र भर,

वो दूसरों के मकानों पर पत्थर चलाते हैं।

कल तक जो खुद कानून की धज्जियाँ उड़ाते थे,

आज वही संविधान बचाओ का राग सुनाते हैं।।

— अज्ञात

तुम्हारी बातों में अब वो तासीर नहीं रही,

तुम्हारे हाथों में अब वो तकदीर नहीं रही।

तुम वो राजा हो जिसका किला ही ढह गया,

तुम्हारे पास अब खुद की तस्वीर नहीं रही।।

— अज्ञात

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